15 करोड़ 66 लाख रुपये की मरम्मत कहाँ हुई? मौत का जाल बना राष्ट्रीय राजमार्ग-6, बराक घाटी और तीन राज्यों के लोग आक्रोशित
बराकबाणी डिजिटल डेस्क, सिलचर, 1 जून : डबल इंजन सरकार की विकास प्रतिबद्धता, भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता (ज़ीरो टॉलरेंस) की नीति और पारदर्शी प्रशासन स्थापित करने का वादा लंबे समय से राज्य और केंद्र सरकार के प्रमुख राजनीतिक नारों में शामिल रहा है। विभिन्न मंचों से भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की बात बार-बार कही गई है। लेकिन बराक घाटी की जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश कर रही है।
सामान्य लोगों का आरोप है कि सरकार चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ कितनी भी सख्त होने का दावा करे, घाटी के कई सरकारी प्रकल्पों और विकास कार्यों में आज भी अनियमितता, अव्यवस्था और जवाबदेही की कमी बनी हुई है। परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित ज़ीरो टॉलरेंस नीति अब कई लोगों को केवल कागज़ी वादा ही प्रतीत हो रही है। बराकवासियों का सवाल है कि यदि वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाया गया है, तो विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद एक के बाद एक परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति इतनी निराशाजनक क्यों है? यही सवाल अब जनमानस में लगातार मुखर होता जा रहा है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है बराक घाटी की जीवनरेखा कही जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-6। सड़क मरम्मत और रखरखाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने का सरकारी दावा किया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस महत्वपूर्ण राजमार्ग की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि आम लोगों, मरीजों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, व्यापारियों और तीन राज्यों के हजारों ट्रक चालकों को प्रतिदिन जान जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ रही है।
शनिवार को कटीगोड़ा के दिगरखाल क्षेत्र में माँ काली होटल के पास हुई एक भीषण दुर्घटना ने इस वास्तविकता को और अधिक उजागर कर दिया। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, सड़क पर बने एक पुल के एप्रोच हिस्से में बने विशाल गड्ढे से बचने की कोशिश में सरिया (लोहे की रॉड) से लदा एक भारी ट्रक नियंत्रण खो बैठा और लगभग 50 फुट गहरी खाई में जा गिरा। ट्रक पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन स्थानीय लोगों की तत्परता से चालक को जीवित बचा लिया गया। गंभीर रूप से घायल चालक को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उसकी हालत चिंताजनक बताई जा रही है।
स्थानीय लोगों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि यह मात्र एक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है। आज एक चालक की जान बच गई, लेकिन कल किसी और की किस्मत इतनी अच्छी नहीं भी हो सकती। वर्तमान में मालीधर से बदरपुर घाट तक लगभग पूरे राजमार्ग पर बड़े-बड़े गड्ढे बन चुके हैं। कहीं सड़क पर जमा पानी छोटी नदी का रूप ले चुका है तो कहीं तालाब जैसी गहरी खाइयाँ बन गई हैं। दिन में किसी तरह स्थिति संभाली जा सकती है, लेकिन रात के अंधेरे में यह सड़क पूरी तरह मौत का जाल बन जाती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि खतरनाक स्थानों पर पर्याप्त चेतावनी संकेत, रिफ्लेक्टर, बैरिकेड अथवा प्रकाश व्यवस्था तक नहीं है। परिणामस्वरूप दूर-दराज़ से आने वाले वाहन चालक अचानक खतरे का सामना करने को मजबूर हो रहे हैं।
हाल ही में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आई एक चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय राजमार्ग-6 के एक महत्वपूर्ण हिस्से की मरम्मत और रखरखाव पर लगभग 15 करोड़ 66 लाख रुपये खर्च किए जाने का दावा संबंधित विभाग द्वारा किया गया है। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज इस भारी खर्च और सड़क की मौजूदा बदहाल स्थिति के बीच गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में यह राशि पारदर्शिता और ईमानदारी से खर्च की गई होती, तो आज मालीधर से बदरपुर तक का विशाल क्षेत्र गड्ढों और टूटी सड़कों से नहीं भरा होता। आखिर लगातार दुर्घटनाएँ क्यों हो रही हैं? आम नागरिकों, यात्री बसों, एम्बुलेंसों और मालवाहक वाहनों के चालकों को अपनी जान जोखिम में डालकर यात्रा क्यों करनी पड़ रही है?
अब यह सवाल केवल आम लोगों तक सीमित नहीं रह गया है। बराक घाटी के जागरूक नागरिक, परिवहन व्यवसायी, विभिन्न सामाजिक संगठन और राजनीतिक हलकों में भी इस मुद्दे पर तीखी चर्चा शुरू हो गई है। उनका मानना है कि करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच जो भारी अंतर दिखाई दे रहा है, उसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि यदि आवंटित धनराशि का सही और प्रभावी उपयोग किया गया होता, तो राष्ट्रीय राजमार्ग की छाती पर तालाब जैसे गड्ढे नहीं बनते, लोगों को रोज़ाना दुर्घटना के भय के साथ यात्रा नहीं करनी पड़ती और चालकों के जीवन को इस प्रकार खतरे में नहीं डाला जाता। उनकी मांग है कि सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और वास्तविकता सामने लाने के लिए पूरे मरम्मत परियोजना की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच तत्काल शुरू की जानी चाहिए।
जनमानस में अब एक ही प्रश्न गूंज रहा है, यदि करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं, तो उसका वास्तविक परिणाम कहाँ दिखाई देता है? और जब तक इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक राष्ट्रीय राजमार्ग-6 की मरम्मत परियोजना को लेकर उठ रहे विवाद और भ्रष्टाचार के आरोप और अधिक तेज़ होने की आशंका बनी रहेगी।
इस सड़क की बदहाली का सबसे बड़ा खामियाजा मरीजों और उनके परिजनों को भुगतना पड़ रहा है। सिलचर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल तथा जिले के अन्य स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने के लिए एम्बुलेंसों को घंटों इस जर्जर सड़क से गुजरना पड़ता है। एक एम्बुलेंस चालक ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा कि कई बार गंभीर मरीजों को तत्काल अस्पताल पहुंचाना होता है, लेकिन सड़क के गड्ढों के कारण वाहन की गति नहीं बढ़ाई जा सकती। इससे मरीजों की पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है और कुछ मामलों में उनकी हालत और भी गंभीर हो जाती है।
इसी प्रकार स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राएँ और शिक्षक-शिक्षिकाएँ भी प्रतिदिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। बसों और छोटे वाहनों में लंबी दूरी तक झटके खाते हुए यात्रा करनी पड़ती है। एक शिक्षिका ने कहा कि मानसून शुरू होते ही ऐसी स्थिति बन जाती है और बरसात के दौरान हालात और भयावह हो जाएंगे। हर दिन यह डर बना रहता है कि कहीं कोई वाहन गड्ढे में गिरकर दुर्घटनाग्रस्त न हो जाए।
गड्ढे से बचने की कोशिश में 50 फुट गहरी खाई में गिरा ट्रक, बाल-बाल बची चालक की जान; हर दिन हजारों लोग उठा रहे हैं जान का जोखिम
राष्ट्रीय राजमार्ग-6 केवल बराक घाटी के लिए ही नहीं, बल्कि त्रिपुरा, मिजोरम और मणिपुर को जोड़ने वाला उत्तर-पूर्व भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग भी है। प्रतिदिन सैकड़ों मालवाहक ट्रक इसी मार्ग से खाद्य सामग्री, निर्माण सामग्री, दवाइयाँ, पेट्रोलियम उत्पाद और अन्य आवश्यक वस्तुएँ ढोते हैं। ट्रक चालकों का कहना है कि सड़क की खराब हालत के कारण वाहनों के रखरखाव का खर्च असामान्य रूप से बढ़ गया है। टायर, सस्पेंशन, एक्सल और अन्य महत्वपूर्ण पुर्जे जल्दी खराब हो रहे हैं। त्रिपुरा जाने वाले एक ट्रक चालक ने कहा, “ऐसा लगता है जैसे हम सड़क पर नहीं, बल्कि किसी युद्ध क्षेत्र से गुजर रहे हों। हर कुछ किलोमीटर पर गड्ढे हैं। बारिश के समय तो यह समझना भी मुश्किल हो जाता है कि सड़क कहाँ है और गड्ढा कहाँ।”
मिजोरम जाने वाले एक अन्य चालक ने कहा कि दुर्घटना होने पर केवल वाहन ही नहीं, बल्कि माल भी क्षतिग्रस्त हो जाता है और कई बार लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। प्रतिदिन सैकड़ों छोटे-बड़े वाहन इस सड़क से सिलचर-गुवाहाटी मार्ग पर आवागमन करते हैं। यात्रियों का कहना है कि पूरा सफर अब भय और अनिश्चितता से भरा रहता है। बड़े गड्ढों से बचने के लिए वाहनों को बार-बार लेन बदलनी पड़ती है, जिससे आमने-सामने की टक्कर का खतरा भी बढ़ जाता है। एक यात्री ने कहा, “बस में बैठने के बाद अब यही चिंता रहती है कि सुरक्षित गंतव्य तक पहुंच पाएंगे या नहीं। सड़क की हालत इतनी खराब है कि पूरा सफर डर में गुजरता है।”
अब सवाल उठ रहा है कि आखिर और कितनी दुर्घटनाएँ, कितने घायल और कितनी मौतें होंगी तब जाकर प्रशासन की नींद खुलेगी? राष्ट्रीय राजमार्ग की स्थिति यदि किसी कच्ची ग्रामीण सड़क से भी बदतर हो जाए, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। स्थानीय लोगों की मांग है कि तत्काल उच्चस्तरीय जांच कर मरम्मत परियोजना में खर्च की गई राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए। साथ ही आपात आधार पर स्थायी और गुणवत्तापूर्ण मरम्मत कार्य शुरू किया जाए। बराकवासियों का आरोप है कि विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों, सरकारी उपलब्धियों के प्रचार और करोड़ों रुपये की परियोजनाओं की घोषणाओं के बावजूद राष्ट्रीय राजमार्ग-6 की वास्तविक स्थिति सरकार के विकास संबंधी दावों पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी है।
जब तक इस सड़क की स्थायी समस्या का समाधान नहीं होता, तब तक हर यात्रा मानो मौत के साथ एक खामोश संघर्ष बनी रहेगी। और इस संघर्ष के साक्षी बने हुए हैं बराक घाटी के लोग, त्रिपुरा-मिजोरम-मणिपुर की परिवहन व्यवस्था और प्रतिदिन इस मार्ग से गुजरने वाले हजारों निर्दोष नागरिक।






