31 सरकारी संस्थानों में 10,903 करोड़ का निवेश, लाभांश मात्र 15 करोड़, अधिकांश संस्थाएं भारी घाटे में
बराकबाणी डिजिटल डेस्क, सिलचर 28 मईः क्या असम की अर्थव्यवस्था सचमुच विकास के राजमार्ग पर दौड़ रही है, या फिर चमकदार प्रचार के पीछे एक गहरा आर्थिक संकट धीरे-धीरे आकार ले रहा है? राज्य विधानसभा में हाल ही में पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग (CAG) की 2024-25 वित्तीय वर्ष की ऑडिट रिपोर्ट ने इस सवाल को फिर से सामने ला दिया है। क्योंकि एक ओर सरकार विकास का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी क्षेत्र की संस्थाओं में हजारों करोड़ रुपये निवेश करने के बावजूद राज्य को लगभग कोई आर्थिक प्रतिफल नहीं मिल रहा है।
कैग की रिपोर्ट में एक चौंकाने वाली और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। असम सरकार ने राज्य की 31 सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं में कुल 10,903 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इनमें 27 सरकारी कंपनियां और 4 वैधानिक निगम शामिल हैं। लेकिन इस भारी निवेश के बदले सरकार को लाभांश के रूप में मात्र 15 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। वह भी केवल असम पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (APGCL) से। यानी 10,903 करोड़ रुपये के निवेश पर सरकार की आय महज 0.11 प्रतिशत रही!
यह आंकड़ा केवल निराशाजनक नहीं, बल्कि राज्य की वित्तीय योजना की गंभीर विफलता का प्रतीक है। क्योंकि सरकार जहां औसतन 6.76 प्रतिशत ब्याज दर पर बाजार से ऋण लेकर इन संस्थाओं में निवेश कर रही है, वहीं उन संस्थाओं से मिलने वाली आय 1 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच रही। अर्थात सरकार कर्ज लेकर ऐसी संस्थाओं को जिंदा रख रही है, जो उल्टा राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ बन चुकी हैं। आसान शब्दों में कहें तो जनता के टैक्स और कर्ज के पैसों से ऐसा ढांचा खड़ा किया गया है, जहां लाभ तो दूर, मूलधन वापस मिलने की भी कोई गारंटी नहीं है।
सरकार ने सरकारी संस्थाओं में भारी निवेश किया, फिर भी नहीं दिख रहा मुनाफा, बढ़ता जा रहा कर्ज और ब्याज का बोझ।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि 27 सरकारी कंपनियों में से 17 फिलहाल घाटे में चल रही हैं। इन कंपनियों का कुल घाटा 592.30 करोड़ रुपये है। इसी तरह चार वैधानिक निगमों में से तीन भारी नुकसान में हैं, जिनका कुल घाटा 112.90 करोड़ रुपये बताया गया है। यानी राज्य की अधिकांश सरकारी संस्थाएं अब संपत्ति नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ बन चुकी हैं। अब सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार ने इन संस्थाओं की कार्यक्षमता का कभी वास्तविक मूल्यांकन किया है? वर्षों से घाटे में चल रही संस्थाओं के पुनर्गठन, निजीकरण या जवाबदेही आधारित सुधार को लेकर क्या सरकार के पास कोई स्पष्ट रोडमैप है? या फिर राजनीतिक स्वार्थ और प्रशासनिक उदासीनता के कारण इन्हें केवल कागजों पर जिंदा रखा जा रहा है?
कैग की रिपोर्ट ने एक और बड़ा विरोधाभास उजागर किया है। सरकार दावा कर रही है कि असम की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 2020-21 से 2024-25 वित्तीय वर्ष के बीच राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) औसतन 18 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़कर 6,43,667 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसी अवधि में पूंजीगत व्यय भी दोगुने से अधिक बढ़कर 12,399 करोड़ रुपये से 26,404 करोड़ रुपये हो गया। लेकिन इस विकास का वास्तविक लाभ आखिर कहां दिखाई दे रहा है? यदि अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है, तो सरकारी संस्थाओं की वित्तीय स्थिति क्यों बिगड़ रही है? हजारों करोड़ रुपये के निवेश के बावजूद सरकार को आय क्यों नहीं मिल रही?
सरकार जिस विकास मॉडल की तस्वीर पेश कर रही है, कैग के आंकड़े उसी तस्वीर का दूसरा पहलू सामने ला रहे हैं, जहां विकास दर तो है, लेकिन वित्तीय दक्षता नहीं; खर्च तो है, लेकिन प्रतिफल नहीं; प्रचार तो है, लेकिन जमीनी परिणाम नहीं। दूसरी ओर राज्य पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले पांच वर्षों में राजस्व आय की तुलना में पेंशन खर्च 15.91 प्रतिशत से बढ़कर 19.37 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसी दौरान ब्याज भुगतान का खर्च 8.01 प्रतिशत से बढ़कर 9.77 प्रतिशत हो गया। यानी सरकार की आय का बड़ा हिस्सा अब पुराने कर्ज के ब्याज और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन चुकाने में खर्च हो रहा है। यदि इसके साथ घाटे में चल रही सरकारी संस्थाओं को बचाए रखने का बोझ भी जुड़ जाए, तो आने वाले समय में राज्य की वित्तीय स्थिरता गंभीर संकट में पड़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल आर्थिक कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का भी प्रमाण है। सरकारी क्षेत्र की संस्थाओं को उत्पादक और लाभकारी बनाने के बजाय वर्षों से राजनीतिक हस्तक्षेप, कुप्रबंधन, नियुक्तियों में अनियमितता और जवाबदेही की कमी ने इन्हें घाटे की खाई में धकेल दिया है। कई मामलों में इन संस्थाओं का ऑडिट, वित्तीय पारदर्शिता और कार्यक्षमता मूल्यांकन भी नियमित रूप से नहीं किया जाता, ऐसी शिकायतें भी सामने आई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस भारी नुकसान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? यदि आम जनता के टैक्स का पैसा केवल घाटा उठाने में ही खर्च होगा, तो विकास के बड़े-बड़े दावों की वास्तविकता क्या रह जाएगी? कैग की यह रिपोर्ट वास्तव में सरकार की वित्तीय व्यवस्था की नींव को हिला देने वाली साबित हुई है। क्योंकि आंकड़ों की भाषा कभी झूठ नहीं बोलती। अब सबकी नजर विधानसभा की लोक लेखा समिति (PAC) पर टिकी हुई है। कैग की रिपोर्ट को विस्तृत समीक्षा और सिफारिशों के लिए समिति के पास भेज दिया गया है।
लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि अधिकांश मामलों में ऐसी रिपोर्टों पर कुछ समय तक राजनीतिक बहस तो होती है, मगर जमीनी स्तर पर बहुत कम बदलाव दिखाई देता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या यह रिपोर्ट भी केवल एक सरकारी दस्तावेज बनकर रह जाएगी, या फिर वास्तव में सरकारी क्षेत्र की वित्तीय व्यवस्था में बड़े सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा? असम की जनता अब इसी जवाब का इंतजार कर रही है।






