রেল পুলিশের নজরে এলেও কেন নেওয়া হলো না ব্যবস্থা, অভিযোগে প্রশ্নের মুখে রেল প্রশাসন
बराकबाणी डिजिटल डेस्क, सिलचर, 24 मई: रेल यात्रा आम लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। विशेषकर सामान्य डिब्बे या जनरल कोच लाखों निम्न और मध्यमवर्गीय यात्रियों के लिए सबसे बड़ा सहारा होते हैं। लेकिन यदि वही डिब्बे यात्रियों के बजाय अनौपचारिक माल परिवहन का माध्यम बन जाएँ, तो स्वाभाविक रूप से सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठने लगते हैं।
भारत सरकार के अधीन रेलवे सेवा को देश की सबसे भरोसेमंद, सस्ती और जनोन्मुख परिवहन व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन जब वास्तविक तस्वीर यात्रियों की आँखों के सामने इससे बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है, तब केवल असंतोष ही नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं। हाल ही में गुवाहाटी से सैरांग जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन में ऐसा ही एक विवादित और चिंताजनक मामला सामने आने का आरोप लगा है, जिसने यात्री सुरक्षा और रेलवे प्रबंधन पर नए सिरे से प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

आरोपों के अनुसार, ट्रेन के सामान्य यात्री डिब्बे के भीतर बड़ी मात्रा में अरबी (कचू) से भरे बोरे इस तरह रखे गए थे कि यात्रियों के सामान्य आवागमन का रास्ता लगभग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया। इतना ही नहीं, कई बोरे शौचालय के प्रवेश द्वार के सामने भी जमा कर दिए गए थे। इसके कारण लंबी यात्रा के दौरान सामान्य यात्रियों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
हाल की इस घटना को लेकर यात्रियों में व्यापक नाराज़गी देखी जा रही है। आरोप है कि पहले से ही अत्यधिक भीड़ वाले जनरल कोच में यात्रियों के बैठने और आने-जाने की जगह घेरकर भारी मात्रा में बोरेबंद सामान ढोया जा रहा था। यात्रियों का कहना है कि सामान्य डिब्बों में वैसे भी न्यूनतम सुविधा और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाती। ऐसे में यदि यात्रियों के लिए निर्धारित स्थान का उपयोग माल ढुलाई के लिए किया जाए, तो यह केवल असुविधा ही नहीं बल्कि सीधा सुरक्षा जोखिम भी बन जाता है।
कई यात्रियों ने आशंका जताई कि किसी आपात स्थिति में यदि कोच को तुरंत खाली करना पड़े, तो इस तरह रखा गया सामान बड़ी बाधा बन सकता है। आग लगने, भगदड़ या दुर्घटना जैसी परिस्थितियों में यात्रियों के बाहर निकलने का रास्ता अवरुद्ध हो जाने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
घटना का एक और चौंकाने वाला पहलू यह बताया जा रहा है कि मामले की जानकारी पहले रेलवे पुलिस तक पहुँची थी और कथित रूप से उन्होंने भी इसे अवैध बताया था। कुछ यात्रियों का दावा है कि पुलिसकर्मियों ने प्रारंभिक स्तर पर कार्रवाई का आश्वासन भी दिया था। लेकिन बाद में कोई स्पष्ट कार्रवाई दिखाई नहीं दी। न तो बोरे हटाए गए और न ही जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई सार्वजनिक कार्रवाई सामने आई।
इस घटना के बाद कई सवाल उठने लगे हैं। यदि यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा जैसे मामलों में भी कठोर कदम नहीं उठाए जाते, तो नियमों और कानूनों का पालन आखिर कैसे सुनिश्चित हो रहा है? आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि रेलवे के कुछ हिस्सों में लंबे समय से प्रभावशाली समूहों के माध्यम से यात्री डिब्बों में अवैध रूप से सामान ढोने की प्रवृत्ति विकसित हो चुकी है, जो कई बार खुले तौर पर होने के बावजूद प्रभावी निगरानी के अभाव में जारी रहती है।
यात्रियों के एक वर्ग का कहना है कि टिकट खरीदकर यात्रा करने के बावजूद उन्हें कई बार अपेक्षित सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता। जबकि रेलवे केवल परिवहन का माध्यम नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की दैनिक जीवन-व्यवस्था का प्रमुख आधार है। घटना को लेकर अब यात्रियों के बीच लगातार यह प्रश्न उठ रहा है कि आम लोगों के लिए निर्धारित जनरल कोच में इतनी बड़ी मात्रा में सामान आखिर पहुँचा कैसे? यात्रियों का कहना है कि रोज़ाना भीड़ झेलते हुए लोग किसी तरह यात्रा करते हैं। ऐसे में यदि यात्री स्थान को बिना रोक-टोक माल ढुलाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि यात्रियों के अधिकारों का भी स्पष्ट हनन है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या टिकट लेकर यात्रा करने वाले सामान्य यात्रियों के लिए बनाए गए डिब्बे अब खुले तौर पर माल परिवहन के साधन बनते जा रहे हैं? यदि ऐसा है तो रेलवे प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कहाँ है? रेलवे पुलिस की भूमिका को लेकर भी विवाद गहरा गया है। आरोपों के अनुसार, शुरुआती आपत्ति के बाद अचानक चुप्पी क्यों छा गई? न तो बोरे हटाए गए और न ही कोई खुली कार्रवाई दिखाई दी। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इसके पीछे किसी प्रभावशाली समूह की भूमिका है, जिसकी निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।
इस घटना के बाद रेलवे प्रशासन की भूमिका को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। यात्रियों का कहना है कि रेलवे केवल राजस्व अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के सुरक्षित आवागमन का आधार है। इसलिए सामान्य डिब्बों में सुरक्षा, व्यवस्था और यात्री अधिकारों के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। अब यात्रियों की मुख्य मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच हो, जिम्मेदारी तय की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़ी निगरानी तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।





