96.96 के स्तर तक पहुंची भारतीय मुद्रा, विदेशी निवेश निकासी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से आम लोगों की मुश्किलें बढ़ीं
बराकबाणी डिजिटल डेस्क, सिलचर, 21 मई: अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अस्थिरता की काली छाया अब सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ती दिखाई दे रही है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई। बुधवार को अंतरराष्ट्रीय फॉरेक्स बाजार में कारोबार शुरू होते ही रुपये को बड़ा झटका लगा। एक झटके में लगभग 40 पैसे टूटकर डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा का मूल्य 96.96 रुपये तक पहुंच गया। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार रुपया इतने निचले स्तर पर पहुंचा है। इससे पहले के ट्रेडिंग सत्र में भी रुपये का मूल्य लगभग 96.61 रुपये के आसपास पहुंच गया था। लेकिन मध्य पूर्व में बढ़ते युद्ध जैसे हालात, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की असामान्य मूल्य वृद्धि और विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पूंजी निकासी के कारण दबाव और अधिक बढ़ गया है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
दिन की शुरुआत में गिरावट के बाद समय बढ़ने के साथ रुपये की कमजोरी और गहराती गई। एक समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का स्तर 96.96 तक पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि मौजूदा वित्त वर्ष में रुपया 97 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकता है। इस वर्ष फरवरी के अंत में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से कुछ ही महीनों में भारतीय मुद्रा लगभग 6 प्रतिशत कमजोर हो चुकी है।
वैश्विक बाजार में इस संकट का एक प्रमुख कारण मध्य पूर्व की अस्थिरता को माना जा रहा है। विशेष रूप से वॉशिंगटन और तेहरान के बीच शांति वार्ता बाधित होने के बाद स्थिति लगातार तनावपूर्ण होती गई है। नए युद्ध की आशंका से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो रही है। सबसे अधिक चिंता हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल परिवहन मार्गों में से एक है। विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया के कुल कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। लेकिन युद्ध जैसी स्थिति के कारण क्षेत्र में सुरक्षा संकट बढ़ने से तेल वाहक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। परिणामस्वरूप वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति घट रही है और कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। डॉलर की मांग जितनी बढ़ती है, रुपये पर दबाव भी उतना ही बढ़ता है।
पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भारी उछाल आया है। फरवरी से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार सूत्रों के अनुसार, वर्तमान में कीमत लगभग 111 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भारत का आयात खर्च खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है। केवल पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल, उर्वरक, रसायन और परिवहन लागत भी कई गुना बढ़ सकती है। इसका सीधा प्रभाव देश के बाजार भाव पर पड़ेगा।
वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ने के साथ विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से भी धीरे-धीरे निवेश निकाल रहे हैं। सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ने से भारत सहित कई विकासशील देशों से पूंजी निकाली जा रही है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर उसे डॉलर में बदलते हैं, तब डॉलर की मांग और बढ़ जाती है। इसी कारण रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। इसका असर शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया है। सेंसेक्स और निफ्टी के कई महत्वपूर्ण सूचकांकों पर दबाव देखा गया है। विशेष रूप से विमानन, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और आयात-निर्भर उद्योगों के शेयरों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस आर्थिक संकट का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ेगा। क्योंकि रुपये की कमजोरी का अर्थ है आयात महंगा होना। और अंततः यह अतिरिक्त लागत बाजार में उपभोक्ताओं पर ही डाली जाएगी। देश के कई हिस्सों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू होने की खबरें सामने आ रही हैं। ईंधन महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ेगी और उसके साथ ही रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ने लगेंगी।
चावल, दाल, खाद्य तेल, सब्जियां, मछली-मांस से लेकर निर्माण सामग्री तक सभी क्षेत्रों में महंगाई की आशंका बढ़ गई है। विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के घरेलू बजट पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टेलीविजन, कैमरा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, चिकित्सा उपकरण और यहां तक कि वाहन के पुर्जों की कीमतों में भी वृद्धि की आशंका जताई जा रही है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताहों में कई इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा सकती हैं। इससे उपभोक्ताओं पर आर्थिक दबाव और बढ़ेगा। केवल घरेलू बाजार ही नहीं, विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए भी यह स्थिति चिंता का कारण बन सकती है। डॉलर महंगा होने से विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस, हॉस्टल खर्च और अन्य खर्च भी बढ़ जाएंगे। इसी प्रकार विदेश में इलाज और यात्रा भी अधिक महंगी हो जाएगी।
ऐसी स्थिति में अब सबकी नजर भारतीय रिजर्व बैंक के कदमों पर टिकी है। आर्थिक विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि आरबीआई बाजार में डॉलर बेचकर रुपये की गिरावट रोकने की कोशिश कर सकता है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात में तेजी से सुधार नहीं हुआ, तो केवल केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित करना मुश्किल होगा। एक तरफ युद्ध की आशंका, दूसरी ओर ईंधन की बढ़ती कीमतें और बाजार में अनिश्चितता इन सबके बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। और इन चुनौतियों का सबसे बड़ा बोझ अंततः आम जनता को ही उठाना पड़ सकता है।







