महंगाई और बेरोजगारी से जनता परेशान है, लेकिन सड़कों पर कोई मजबूत और प्रभावी आंदोलन दिखाई नहीं दे रहा।
बराकबाणी डिजिटल डेस्क, 21 मई: भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में विपक्षी राजनीति की प्रभावशीलता, जनसंपर्क और आंदोलनों के स्वरूप को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। विशेषकर सोशल मीडिया आधारित राजनीति के बढ़ते प्रभाव और जमीनी आंदोलनों की लगातार घटती मौजूदगी को लेकर राजनीतिक हलकों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी असंतोष और संशय बढ़ रहा है। एक वर्ग का मानना है कि वर्तमान विपक्षी दल वास्तविक सड़कों की राजनीति छोड़कर अब काफी हद तक वर्चुअल दुनिया की राजनीति तक सीमित हो गए हैं। और इसी अवसर का भाजपा कुशलतापूर्वक लाभ उठा रही है।
2014 में केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से देश की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़ा बदलाव आया है, ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है। उनके अनुसार, एक समय था जब महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं या जनजीवन से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर विपक्षी दल सड़कों पर उतरते थे। कांग्रेस शासन के दौरान पेट्रोल-डीजल की मामूली कीमत वृद्धि पर भी हजारों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ बड़े आंदोलन किए जाते थे। सड़क पर बैठकर प्रदर्शन, रेल रोको, थाना घेराव, यहां तक कि पानी की बौछार और लाठीचार्ज का सामना करते हुए आंदोलन जारी रखने के अनेक उदाहरण देखने को मिलते थे।
जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार जनआंदोलन की कमी के कारण लोगों के बीच राजनीतिक निराशा और व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है।
लेकिन अब तस्वीर काफी बदल चुकी है, ऐसा आरोप लगाया जा रहा है। वर्तमान में विपक्ष का अधिकांश विरोध सोशल मीडिया, प्रेस कॉन्फ्रेंस और टीवी डिबेट तक सीमित होकर रह गया है। आम लोगों के एक हिस्से का आरोप है कि वास्तविक समस्याओं के खिलाफ प्रत्यक्ष जनआंदोलन के बजाय अब “ट्रेंडिंग हैशटैग” या “फेसबुक पोस्ट” ही विपक्षी राजनीति का मुख्य हथियार बन गए हैं। इसके कारण आम जनता और विपक्षी राजनीति के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी याद दिला रहा है कि भाजपा रातोंरात देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी नहीं बनी। लंबे समय तक सड़कों पर संघर्ष, संगठन निर्माण और जमीनी स्तर पर लोगों से संपर्क बनाए रखने के कारण ही पार्टी आज इस स्थिति तक पहुंची है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कई बार गिरफ्तारियां झेलनी पड़ीं, आंदोलनों में बाधाओं का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने संगठन को सक्रिय बनाए रखा। इसके मुकाबले वर्तमान विपक्ष की आंदोलनकारी धार काफी कमजोर पड़ चुकी है, ऐसी राय विभिन्न हलकों से सामने आ रही है।
हालांकि विपक्षी नेताओं की राय इससे अलग है। उनका आरोप है कि वर्तमान केंद्रीय सरकार विपक्षी आवाज़ों को दबाने के लिए प्रशासनिक दबाव, जांच एजेंसियों के इस्तेमाल और मीडिया के एक हिस्से का सहारा ले रही है। कई विपक्षी नेता खुले तौर पर आरोप लगाते हैं कि देश का एक बड़ा मीडिया वर्ग अब “गोदी मीडिया” में बदल चुका है और सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा करने की कोशिश होते ही विभिन्न प्रकार की बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं। उनका दावा है कि लोकतांत्रिक विरोध की जगह लगातार सीमित की जा रही है।
लेकिन आलोचक इस तर्क पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि वास्तव में विपक्ष को संघर्ष करने का अवसर ही नहीं मिल रहा, तो फिर चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का औचित्य क्या है? दूसरी ओर यदि आम जनता पूरी तरह विपक्ष को नकार चुकी होती, तो विभिन्न चुनावों में विपक्षी दलों को मिलने वाले उल्लेखनीय वोटों की व्याख्या क्या होगी? “भारत जोड़ो यात्रा” और “न्याय यात्रा” जैसे कार्यक्रमों के वास्तविक राजनीतिक प्रभाव पर भी कई लोग सवाल उठा रहे हैं। आलोचकों के अनुसार, ये कार्यक्रम जनता के मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ने में असफल रहे, क्योंकि वे लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं और वास्तविक जरूरतों से सीधे जुड़ नहीं सके।
एक वर्ग का मानना है कि वर्तमान विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह आम जनता के बुनियादी मुद्दों से लगातार दूर होती जा रही है। महंगाई, रोजगार, किसान समस्याएं, स्वास्थ्य व्यवस्था या शिक्षा जैसे मुद्दों पर निरंतर आंदोलन करने के बजाय कई बार विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय या अमूर्त राजनीतिक मुद्दों पर अधिक मुखर देखा जाता है। परिणामस्वरूप गांवों के सामान्य लोग या निम्नवर्गीय मतदाता उस राजनीतिक विमर्श से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पाते। राजनीतिक संवाद की यही खाई भाजपा के लिए बड़ा लाभ पैदा कर रही है, ऐसा विश्लेषकों का मत है।
दूसरी ओर भाजपा ने लगातार जमीनी स्तर पर अपने संगठन को मजबूत किया है। बूथ स्तर के संगठन, सरकारी योजनाओं के प्रचार, प्रत्यक्ष जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों के राजनीतिक उपयोग के मामले में पार्टी कहीं अधिक सक्रिय रही है, ऐसा राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है। इसलिए जब विपक्ष मुख्यतः डिजिटल प्लेटफॉर्म तक सीमित है, तब भाजपा जमीनी राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रही है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी सुनने को मिल रही है कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के बीच एक प्रकार की अनकही समझ काम कर रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि वास्तविक जनआंदोलनों के बजाय कई बार केवल राजनीतिक नाटक मंचित किए जाते हैं। आम लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया जाता है, लेकिन नेतृत्व का बड़ा हिस्सा सुरक्षित दूरी से स्थिति पर नजर रखता है। परिणामस्वरूप आंदोलन के दौरान आम लोगों को लाठीचार्ज, गिरफ्तारी और प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ता है, जबकि राजनीतिक नेतृत्व बाद में उसी परिस्थिति का अपने हित में इस्तेमाल करता है, ऐसा आरोप भी लगाया जा रहा है।
इसी कारण आम लोगों के बीच विपक्षी राजनीति के प्रति विश्वास का संकट बढ़ रहा है, ऐसा कई लोग मानते हैं। क्योंकि महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य संकट और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों जैसी समस्याओं से आम जनता लगातार जूझ रही है, लेकिन उस जनअसंतोष को मजबूत जनआंदोलन में बदलने में विपक्ष लगभग विफल साबित हो रहा है। इसलिए एक वर्ग का मानना है कि वर्तमान विपक्षी राजनीति का बड़ा हिस्सा केवल प्रतीकात्मक विरोध और “सस्ती राजनीति” तक सीमित होकर रह गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि विपक्ष वास्तव में जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है, तो उसे सोशल मीडिया की सीमाओं से बाहर निकलकर फिर से सड़कों पर लौटना होगा। लोगों के घर-घर तक पहुंचकर वास्तविक समस्याओं को केंद्र में रखकर निरंतर आंदोलन खड़े करने होंगे। क्योंकि भारतीय राजनीति का इतिहास बार-बार यह साबित कर चुका है कि केवल डिजिटल प्रचार से नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर और जनता के साथ खड़े होकर ही लोगों का विश्वास जीता जा सकता है।







